Wednesday 16 July 2014

कैसे दे सुरक्षा बेटियों को—पुरुष प्रधान समाज को इंसानियत प्रधान समाज बनाईए और बेफ्रिक हो जाईए




कुछ दिन पहले ही मैने पुरुषों से एक विनम्र आग्रह नामक पोस्ट के द्वारा लड़कियों की व्यथा को प्रकट करने का एक प्रयास किया था। इस पोस्ट के संबंध में मुझे मिलने वाली प्रतिक्रियाओं में मुझे बताया गया कि स्त्री एवं पुरुष दोनों ही समाज के पहिए हैं या यह पुरुष प्रधान समाज है और सदियों से ही रहा है और शायद कब तक रहेगा कुछ कह नहीं सकते। मैं आप सभी के विचारों का तह दिल से आदर करते हुए आप सभी से अपील करना चाहती हूं कि आप समस्या की जड़ों को पहचाने की कोशिश करें। आप सभी के घर में बेटियां तो हैं ही। सुबह-सुबह अखबार भी पड़ते ही हैं सभी—दूसरे पन्ने से तीसरे पन्ने तक हर रोज किसी न किसी लड़की के साथ बलात्कार होने की चार से पांच तक घटनाएं होती ही हैं। मेरे तो पड़ कर, जरा सा विचार करने पर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इनकी उर्म तो देखिए—पांच से पंद्रह वर्ष या 82 वर्ष की वृद्ध महिलाएं । युवतियां तो हमेशा से ही इन दरिंदों के चपेट में आती रही हैं। बच्चों को अक्सर हम बाहर भेजते हैं खेलने के लिए, या पास ही की दुकान पर कुछ छोटा मोटा समान खरीदने के लिए या रिश्तेदार भी घरों में आते रहते हैं। देखने में आया है कि ये लोग अक्सर पीड़िता के परिचित ही होते हैं। छोटी बच्चियों को टॉफियों का लालच देते हैं। बच्चे तो वैसे भी कितने भोले होते हैं कितनी जल्दी विश्वास कर लेते हैं ये सभी पर। अब इस स्थिति में सोचिए लड़कियों का गलियों में खेलना भी दूभर हो गया है। ये घटनाएं तो हमें दिन प्रतिदिन शक्की बनाए जा रही हैं। हर वक्त मन में यह डर लगा रहता है कि कौन मनुष्य के भेस में वासना का दरिंदा हमारे घर के आस-पास घूम रहा है। यह समस्या इतना विकराल रुप ले चुकी है कि इसके खात्मे के लिए तो हमें कम से कम अपने बेटों के पालन-पोषण की तो जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी। क्योंकि हमारी कानून व्यवस्था में तो इतनी खामियां है कि यह इस अंधियारे में कोई रोशनी देने में बेसर साबित हुआ है। क्या हम हमेशा कानून का ही मुंह तकते रहेगें। अरे यह कोई पुरुष प्रधान समाज नहीं है यह तो भेड़िया प्रधान समाज है। हमारा कर्तव्य है कि पहले हम अपने समाज को इंसानियत प्रधान समाज तो बनाएं। किसने दिया हक पुरुषों को कि वो अपने को लड़कियों से बेहतर समझे। ईश्वर की संतान दोनों हैं। आत्मा का वास भी दोनों में है। दोनों ही बराबर है। स्त्रियों और पुरुषों , दोनों ही सृष्टि को आगे बढ़ाने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं। किन्तु मेरी गुजारिश है कि बदलाव की शुरुवात हमें अपने घरों से ही करनी होगी। बात शैक्षिक वर्ग-अनपढ़, अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, बच्चा-युवा इत्यादि की तो है ही नहीं। आप सभी को पता है कि उल्लेखित सभी वर्ग लड़कियों के उत्पीड़न में शामिल है। जब हर तबके के लड़के लड़कियां एक दूसरे को सम्मान की दृष्टि से देखेगें तो ऐसी घटनाएं कम होने लगेंगी। बूंद-बूंद से ही सागर भरता है। हमें प्रयास करना है कि हमारे घर में जिस बालक का जन्म हुआ है, हम उसे बचपन से ही ये सिखाना शुरु कर दे कि एक दूसरे का सम्मान करना ही सभ्य समाज की निशानी है। और यह जो हम सभी नारा लगाते रहते हैं कि बेटा चाहिए, बेटा चाहिए इसे बदलकर यह कहना शुरु कीजिए शारीरिक रुप से स्वस्थ संतान मिले जिसे जीवन के अच्छे संस्कार देकर हम समाज के लिए अपना कुछ योगदान तो दे सके।
अब आप यह मत कहिएगा कि आपके घर में तो लड़के-लड़की में कोई फर्क नहीं। जरा अपने अंतर्मन को टटोलिए और सोचिए कि सिर्फ कहने से कोई बदलाव नहीं आता है। बदलाव आता है सोच-विचार कर उसे पहले अपने जीवन में उतार कर लाने से-----यदि हम आज से ही अपने मन की जो संकुचित सोच को बदल दें तो कम से कम हमारे घरों से तो कोई ऐसा नहीं बनेगा और यदि मेरे विचारों से किसी एक घर की सोच में कुछ बदलाव आ जाता है तो यही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार होगा। सबसे पहले हमें जिम्मेदारी अपनी लेनी होगी। मैं तो तैयार हूं क्या आप सभी तैयार हैं

आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इंतजार रहेगा-------
मीनाक्षी 16-07-14© सर्वाधिकार सुरक्षित



Monday 7 July 2014

कलयुग में मासूमों को परोसा जा रहा है विषैला दान




बहुत अजीब सा है यह समय जब इंसानियत नाम ही स्वार्थ, निर्दयता का पर्यायवाची बन के रह गया है। आजकल तो दुनिया में भगवान का रुप कहे जाने वाले, सबसे मासूम व निर्दोष माने जाने वाले बच्चों को मिड-डे के रुप में विषैला खाना खिलाया जा रहा है । सरकार की सुनें तो अक्सर ये मिड डे मील ऐसे बच्चों को दिया जाता है जो बेचारे बदकिस्मती से गरीब घरों में जन्में हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब में नहीं होती है। हमारी संस्कृति और हमारे मानवीय व्यवहार के अंतर्गत हमारा यह कर्तव्य है कि हम ऐसे लाचार बच्चों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं तो मुहैया करवाएं। बहुत ढोल पीट पीट कर ऐसे दिखावे किए जाते हैं कि कितना कुछ किया जा रहा है । पर यह क्या कंकड़ तो हमारी दाल और चावल में भी कभी-कभी निकल ही जाते हैं पर यहां तो मासूम बच्चों को चूहे, छिपकलियां और तो और कॉकरोच परोस-परोस कर दिए जा रहे हैं । जब अपने बच्चों को खिलाने का सोचते हैं तो दुनिया भर की सारी हाईजनिक बातों का ख्याल आता है न हर घर में आरो किस के लिए लगवाते हैं आप, अपने नन्हें मुन्हों का कितना ध्यान रखते हैं हम सभी। इन बच्चों को आप भूखा ही रहने दीजिए। पानी पीकर भी कुछ दिन तो इन्हें राहत मिल ही सकती है पर अरे यह क्या आप तो उन्हें खाने के नाम पर छिपकलियां और चूहे खिला-खिला कर मारने पर ही अतारू हो गए हैं। इन्हें नहीं चाहिए आपका विषैला दान। गरीब ही सही ये सभी अपनी मां की आंख के तारे हैं। हमारे देश का सुनहरा भविष्य हैं जब ईश्वर का रुप समझे जाने वाले इन मासूमों का यह हाल है तो सोचिए हमारे जैसे आम लोगों के साथ क्या हो सकता है हमारे देश में--------------मीनाक्षी   7-07-14