Monday, 19 May 2014

मकान या घर



कई बार मैं सोचती हूं कि हमारे कहने और सोचने में कितना फर्क होता है । जब हम रोजी रोटी की तलाश में भटकते है या नौकरी के थपेड़ों को सहते हैं तो अक्सर अपने बच्चों को यह कहकर तसल्ली देते रहते हैं कि यह सब हम तुम्हारे लिए कर रहे हैं । यह घर जो मैने अपने खून पसीने से बनाया है वो तुम्हारे लिए है। लेकिन जैसे ही लड़के की शादी हो जाती है तो हर बात पर यह जतलाते हैं कि अगर यहां रहना है तो हमारे मुताबिक चलना होगा वर्ना तुम कहीं और चले जाओ। आप सभी से मैं माफी मांगना चाहती हूं। हो सकता है मेरे विचारों से आप सहमत न हों मेरे विचार व्यक्तिगत हैं ये मेरे अनूभव हैं । मैट्रो में जाओ, पार्क में बैठो , ऑफिस जाओ या किसी रिश्तेदार के घर मैने अक्सर माता-पिता को अपने लड़के और बहु की बुराईयां करते ही सुना है और बहुएं अपने सास-ससुर की। क्योंकि सिर्फ कहने से ही कोई आपकी मां, पिता या बेटी नहीं बन जाता है। आपका बच्चा चाहे कितना ही गलत क्यों न हो, आप कभी भी किसी से उसकी बुराई नहीं सुन सकते और आपकी बहु चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हो अगर उसकी कोई तारीफ कर रहा हो तो भी आपके लिए सहना कितना मुश्किल हो जाता है। जरा सोचिए मुझसे बिना नाराज हुए। क्या मुझे मालूम नहीं है कि आजकल बच्चे प्रापटी के लिए अपने माता-पिता का जीना मुश्किल कर देते है। बहुएं भी बहुत तेज हैं लेकिन ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। आप भी अपने बच्चों को घर का ताना मारना छोड़ दीजिए। घर, घर तभी बनता है जब उसमें रहने वाले लोगों में आपसी प्यार हो, समझ हो एक दूसरे के प्रति लगाव हो, जब हम घर से बाहर हो तो हमें घर की याद आए पर आजकल तो कितने लोग सिर्फ सोने या खाने के लिए ही घर जाते हैं ऐसा तो होटल में भी होता है। अपने आप से पूछिए कि कितने लोगों का अपने घर यानि वास्तविकता में मकान में जाने को मन करता है भई मैं तो लिख ही डालती हूं इसका जवाब-------




ईंटो और गारों से तो बनता है मकान----- कोई घर नहीं
फर्नीचर , टाइलों से सजाते हो मकान तुम कोई - घर नहीं

इस थकी-थकी सी जिंदगी में अगर सकून की तलाश है तुम्हें
तो लाओ सोच में भी अपनी खुशबू बस बढ़िया बिस्तर ही नहीं

मेरा तो मन घबराने लगा वहां जाने का अब जो टाईम हुआ
गले लगके ही मिटेती हैं दूरियां दिलों की, शब्दों के जादू से नहीं

बहुत बड़ा है मकान तुम्हारा मुझे इसमें कोई शक तो नहीं
लेकिन बिना हमारे तुम्हारा मकान किसी शम्शान से कम भी नहीं

घर न बनता है पैसों , न ही सीमेंट और रेत की दीवारों से
ये तो बनता है तेरी-मेरी प्यारी सी मुस्कानों से
यूं न तूं बात बात पे हमें मकान का रौब दिखा
भूल क्यों जाते हो यह मकान वैसे तेरा भी नहीं

ऐ खुदा कर मदद तू मेरा घरौंदा बनाने में जरा
मेरे पंछी भी उड़ने को हैं व्याकुल अपने पंख फैला
इनकी किलकारियों से ही हम है तेरे इस मकान से नहीं-----


मीनाक्षी भसीन © सर्वाधिकार सुरक्षित



19-05-14



No comments: