Monday, 26 May 2014

सरकारी कर्मचारी की पहचान



मैं अपनी तारीफ नहीं कर रहीं हूं पर कई बार मेरे साथ ऐसा हुआ कि बस में या कहीं सफर करते हुए जब कभी कभी बातों-बातों में किसी को मैने यह बताया कि मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं तो वे हैरान हो गए । मैने पूछा- इसमें हैरान होने वाली कौन सी बात है तो उन्होंने कहा कि सरकारी लोग तो शक्ल से ही सरकारी लगते हैं। चेहरे से ही ऐसे हाव-भाव होते है कि बस उन्हें देख कर ही ऐसा लगता है कि ऑफिस में सोने के लिए जा रहे हैं। खास तौर पर हमारा युवा वर्ग सरकारी लोगों की तो हमेशा खिल्ली ही उड़ा रहा होता है। लड़कियों को भी अक्सर यह कहकर नौकरी के लिए प्रेरित किया जाता है कि भई या तो टीचर बन जाओ या सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करो। सरकारी नौकरी लग गई तो बस आराम ही आराम है। लेकिन सब सरकारी लोग एक जैसे नहीं होते। मैने कई लोग देखे हैं जो बहुत मेहनत से काम करते हैं। निजी कंपनियों में भी कई लोग आलस और चापलूसी का सहारा लेते हुए पाए जाते हैं। बात सरकारी या गैर सरकारी की नहीं है । तो मनुष्य प्रकृति की है इसमें विविधा तो सभी जगह विद्यमान है। यही सोचते हुए मैने यह लिख डाला--------


बुझा हुआ चेहरा, निराश ऑंखे, यही तो सरकारी कर्मचारी की पहचान है
टेबल पर लगा कर फाइलों का ढेर चाय की चुस्कियां भरना, यही तो इनकी शान है

मेहनतकश को शिकार बनाते अपने काम से जी चुराते
लुक बीजी डू नथिग का मोटो ही तो इनकी जान है


मुझसे पूछो कितने धक्के खाए, क्वालीफाइड होकर भी मैने कितने ऑसू बहाए
कई संघर्षों के बाद मिल ही गया मुझे सरकारी कर्मचारी का तमगा
सचमुच! मेरा ईश्वर महान है

जागो, उठो, बढ़ो कर्मचारी मेहनत ही डालेगी रंग और खुशबु तुम्हारे पैसे में
आलस से जब लगने लगे का जंग तुम्हारे विचारों में
कैसे खरीदोगे फिर तन-मन पैसे में
ईमानदारी, मेहनत को बना लो आदत अपनी
फिर देखो कितना सुंदर यह जहान है!


मीनाक्षी भसीन                26-05-14© सर्वाधिकार सुरक्षित

1 comment:

meenakshiprd bhasin said...

हम कितना कुछ सोचते हैं और चाहते हैं कि सब को बताएं। मेरा मानना है कि लेखनी की ताकत बोलने से कहीं अधिक होती है। आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझे बहुत प्रोत्साहन मिल रहा है और मेरे लिखने का एकमात्र उददेश्य है कि हम सब मिलकर अपने सोचने के नजरिए में जरा बदलाव लाएं यह सिर्फ आपके लिए ही नहीं है मैं भी इसी दिशा में अग्रसर हूं क्योंकि अगर हम समाज में कोई बदलाव लाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी सोच में लाना होगा । अगर हम सभी यह सोच लें कि हमें किसी तरह वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना है जिसकी हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं तो अपनी उन्नति की एक सीढ़ी तो मानो हमने चढ़ ही ली है। एक बार फिर से आपके सहयोग के लिए धन्यवाद-----मीनाक्षी